शनिवार को भारतीय क्रिकेट इतिहास के महान कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का जन्मदिन था, तो वहीं आज यानि रविवार को भारतीय क्रिकेट टीम के एक और महान कप्तान सौरव गांगुली अपना जन्मदिन मना रहे हैं।
भारतीय क्रिकेट में सबसे बड़ा बदलाव लाने वाले प्रिंस ऑफ कोलकाता कहे जाने वाले सौरव गांगुली का जन्म 8 जुलाई 1972 को कोलकाता में हुआ।

इन पांच वजहों से दादा को नहीं भुलाया जा सकता कभी
सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट का एक बहुत बड़ा नाम है। इस खिलाड़ी को भारतीय क्रिकेट में बदलाव लाने का सबसे बड़ा श्रेय दिया जाता है।
आज हम आपको उनके जन्मदिन विशेष में बताने जा रहे हैं सौरव गांगुली आखिर किन वजहों से भारतीय क्रिकेट में कभी नहीं भुलाए जा सकते हैं।
सौरव गांगुली थे एक बेहतरीन बल्लेबाज
सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट में एक जबरदस्त कप्तान के रूप में याद किया जाता है। कप्तानी के साथ ही सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट के दिग्गज बल्लेबाजों में शुमार रहे।
गांगुली ने भारतीय क्रिकेट में अपने टेस्ट क्रिकेट की शुरूआत 1996 में की। इसके बाद तो गांगुली ने अपने पहले और दूसरे दोनों ही मैचों में शतक जड़ा जिसके बाद तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गांगुली ने अपने इंटरनेशनल करियर में 18 हजार से ज्यादा रन बनाए। दादा ने टेस्ट करियर में जहां 113 मैचों में 7212 रन तो वहीं वनडे करियर में गांगुली के बल्ले से 311 मैचों में 11363 रन निकले।

टीम की बदल दी धारणा
भारतीय क्रिकेट टीम को 2000 से पहले के समय के दौरान घर का शेर कहा जाता था। भारतीय टीम तब अपने देश में तो भारी पड़ती थी, लेकिन बाहर निकलते ही हवा निकल जाती थी। ऐसे समय में साल 2000 में सौरव गांगुली ने टीम की कमान संभाली।
सौरव गांगुली ने कप्तान बनते ही भारतीय टीम की उस धारणा को बदल डाला, जिसमें उनकी मानसिकता केवल घर में शेर होने की थी।
सौरव गांगुली ने कप्तान बनने के बाद भारतीय टीम को बाहर भी जीतने के लिए प्रेरित किया। साल 2002 में गांगुली की कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड को उनके ही देश में नेटवेस्ट ट्रॉफी के रूप में बड़ी जीत हासिल की जिसका प्रभाव ऐसा रहा कि गांगुली की टीम ने अपने देश से बाहर सफलता हासिल करना शुरू कर दिया। जिसमे ऑस्ट्रेलिया की जमीं पर 2003 में टेस्ट सीरीज बराबरी पर खत्म करने के साथ ही 2003 में दक्षिण अफ्रीका की जमीं पर विश्व कप का उपविजेता रहा।

गांगुली ने युवा टैलेंट को किया आगे लाने का काम
सौरव गांगुली ने भारतीय टीम के कप्तान बनने के साथ ही रणनीति में बदलाव कर दिया। सौरव गांगुली ने भारतीय टीम की सोच बदलने के साथ ही टीम में और भी कई बदलाव किए। उस दौर में भारतीय टीम में कई युवा खिलाड़ियों में जबरदस्त प्रतिभा नजर आती थी लेकिन सौरव गांगुली ने इन युवा प्रतिभा को सामने लाने का काम किया।
सौरव गांगुली ने अपनी कप्तानी में कई ऐसे युवा टैलेंट को परखा जो आगे जाकर भारतीय क्रिकेट में बड़ा नाम हुए। गांगुली ने अपनी टीम में युवराज सिंह, वीरेन्द्र सहवाग, जहीर खान, आशिष नेहरा, हरभजन सिंह, गौतम गंभीर और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ियों को मौका दिया। गांगुली इन खिलाड़ियों को टीम में शामिल करने के लिए कई बार तो सेलेक्टर्स से लड़ भी बैठे।

कभी हार नहीं मानने वाली मानसिकता
सौरव गांगुली को एक योद्धा खिलाड़ी कहा जा सकता है। सौरव गांगुली अपने क्रिकेट करियर में बहुत बड़े फाइटर रहे। सौरव गांगुली में खास बात ये थी कि मैच की परिस्थिति चाहे जैसी हो लेकिन वो हार नहीं मानते थे।सौरव गांगुली की कभी हार ना मानने वाली इस सोच ने भारतीय क्रिकेट में बड़ा बदलावा लाया।
साल 2005 में ग्रेग चैपल के साथ विवाद के बाद गांगुली का करियर खत्म माना जा रहा था लेकिन गांगुली ने जबरदस्त अंदाज में वापसी की और साल 2007 में अपनी बेहतरीन फॉर्म दिखायी। गांगुली ने 2007 में वनडे में 1 हजार रन बनाए। तो टेस्ट क्रिकेट में भी खूब बल्ला चला।
इस साल गांगुली के बल्ले से दोनों फॉर्मेट में मिलकर सबसे ज्यादा 2346 रन निकले। दादा के इसी अंदाज ने उनको पूरे करियर में बहुत सम्मान दिलाया।

क्रिकेट करियर के खत्म होने के बाद प्रशासनिक अधिकारी का सफर
सौरव गांगुली ने एक क्रिकेटर के तौर पर भारतीय क्रिकेट को जो दिया उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। कुछ उसी तरह से सौरव गांगुली क्रिकेट करियर के खत्म होने के बाद भी भारतीय क्रिकेट को अपना योगदान देना चाहते थे।
इसी सोच के साथ उन्होंने क्रिकेट कोच की बजाए प्रशासनिक तौर पर सेवा देने का रास्ता चुना। सौरव गांगुली पूरी ईमानदारी के साथ आज बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर हैं।
सौरव गांगुली ने प्रशासनिक रूप में सोच को भी बदल डाला है।

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