जिन खिलाड़ियों को हम एक स्टार के रूप में देखते हैं. उसके पीछे उन खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत होती है. जिसके दमपर वह एक स्टार खिलाड़ी बनते हैं. ऐसे ही एक भारतीय टीम के खिलाड़ी मनोज तिवारी हैं. मनोज एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज हैं. मनोज के एक क्रिकेटर बनने का सफ़र काफी संघर्ष भरा रहा.
गरीबी से निकलकर बने भारतीय टीम के क्रिकेटर

14 नवंबर 1985 को हावड़ा में जन्मे मनोज तिवारी का बचपन गरीबी से गुजरा. उनके परिवार में कुक 5 सदस्य थे. पिता रेलवे में काम किया करते थे. मगर पिता इतना पैसा नहीं कमा पाते थे कि परिवार का जीवनयापन बेहतर ढंग से हो सके. मनोज का बचपन से क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था. वह क्रिकेटर बनने का सपना देखते मगर पैसे की कमी दीवार बनकर सामने आ जाती.
जिस कारण वह क्रिकेट का किट तक को नहीं खरीद पा रहे थे. क्रिकेट के प्रति मनोज तिवारी के जुनून को देखर कर बड़े भाई राज कुमार तिवारी ने लोन लेकर मनोज को एक लोकल क्लब में भर्ती करवा दिया.
इसके बाद मनोज ने भी जी तोड़ कर मेहनत की और सारा ध्यान अपने खेल पर केंद्रित किया. 2005 मनोज के जीवन का एक अहम वर्ष रहा. इस वर्ष उन्हें पहला रणजी मैच खेलने का मौका मिला और इसी वर्ष उन्हें अंडर-19 भारतीय टीम का कप्तान भी बना दिया गया. ये उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी.

मनोज ने 2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारतीय टीम में डेब्यू किया. अभी तक उन्होंने कुल 12 वनडे मैच भारतीय टीम की ओर से खेले हैं. हालांकि ये मैच उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित नहीं करते. जिसका कारण है कि उनकी इंजरी भी रही है.
मनोज तिवारी ने साल 2012 के आईपीएल के फाइनल मुकाबले में एक यादगार पारी खेली थी. इस मैच में कोलकाता की ओर से बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने टीम को आईपीएल का खिताब जिताने में अहम भूमिका निभाई थी.
मनोज ने 106 फर्स्ट क्लास मैच खेले हैं. जिसमें 50.27 की औसत से 7642 रन बनाए. जिसमें उनके बल्ले से 34 शतक और 31 अर्द्धशतक निकले. वहीं इस दौरना उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 267 रन रहा.
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