नई दिल्ली
आज से 70 साल पहले इतिहास के आईने में झांक कर देखें, तो आज ही के दिन यहां भारत की एक गौरवगाथा छिपी है। 12 अगस्त 1948 को भारत लंदन में आयोजित हो रहे ओलिंपिक खेलों में पुरुष हॉकी स्पर्धा के फाइनल में था। यहां उसे उसी टीम (ब्रिटिश) के खिलाफ जंग लड़नी थी, जिन्होंने हम पर सदियों तक राज किया था। इस तारीख के 3 दिन बाद ही देश अपनी स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ को मनाने की तैयारी कर रहा था। यहां से 7000 किलोमीटर दूर 11 भारतीय खिलाड़ी इस बार वेम्बली स्टेडियम में हॉकी के मैदान पर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। भारतीय हॉकी टीम आजादी की पहली वर्षगांठ से पहले देश का खास तोहफा देना चाहती थी।
इससे पहले ब्रिटिश टीम एक बार भारत के खिलाफ यह कहकर खेलने से इंकार कर चुकी थी, कि भारत उसके उपनिवेशों में से एक है, तो वह भारत के खिलाफ नहीं खेलेंगे। लेकिन इस बार ग्रेट ब्रिटेन की टीम ऐसा नहीं कर सकती थी। अब भारत आजाद था और उसके खिलाड़ियों ने आजाद अंदाज में ही ब्रिटिश टीम के खिलाफ हॉकी खेली। भारत ने इस फाइनल में ग्रेट ब्रिटेन को 4-0 से मात दी। यह ओलिंपिक में भारत का लगातार चौथा गोल्ड था। इस तरह आजाद भारत ने 1948 में अपने पहले ओलिंपिक गोल्ड पर कब्जा जमाया।
1948 ओलिंपिक फाइनल में अपना दूसरा गोल दागने के दौरान बलबीर सिंह
इस बार ओलिंपिक में तिरंगा झंडा सबसे ऊपर लहरा रहा था। यह पहला मौका था, जब ओलिंपिक में भारतीय तिरंगा लहराया जा रहा हो। भारत इतिहास रच चुका था। इन ओलिंपिक खेलों में सब-इंस्पेक्टर बलबीर सिंह ने अपना डेब्यू किया था। इन ओलिंपिक खेलों के अंत तक वह हीरो बन चुके थे। सेंटर फॉरवर्ड पर खेलने वाले बलबीर सिंह ने फाइनल मैच में 2 गोल किए। वहीं 1-1 गोल त्रिलोचन सिंह और पत जनसेन ने दागे।
93 वर्षीय बलबीर सिंह बताते हैं, 'मैच जीतने के बाद हमारा तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था इसके साथ-साथ हमारा राष्ट्र गान बज रहा था। यह नजारा देख तब मेरे स्वतंत्रता सेनानी पिता के शब्द थे, हमारा झंडा, हमारा देश' उनके इन शब्दों को सुनकर मैं समझ चुका था कि इस सबके के क्या मायने हैं। मैं भी ऐसा महसूस कर रहा था कि मैं भी मैदान से ऊपर उठ रहा हूं।
बलबीर सिंह ने इसके बाद 1952 और बतौर कप्तान 1956 ओलिंपिक में भी हॉकी टीम के गोल्ड जीतने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन इसके बावजूद बलबीर सिंह के 1948 का पल ही सबसे खास है। भारत की इस गोल्ड जीतने पर पूरे देश ने सराहा था। आजाद भारत के लिए उसकी आजादी की पहली वर्षगांठ से पहले यह एक खास लम्हा था।