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पृथ्वी शॉ को ऐसे ही नहीं मिली है भारतीय टीम की कैप, इसके लिए पृथ्वी और उनके पिता को देने पड़े हैं ये 5 बलिदान

आज पूरी पृथ्वी और आसमां में पृथ्वी शॉ का नाम गूंजायमान है। भारतीय क्रिकेट टीम में गुरूवार को 18 साल और 329 दिन की उम्र के एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज ने ना केवल डेब्यू किया बल्कि डेब्यू को शतक से यादगार बना दिया।

पृथ्वी शॉ को भारतीय टीम तक पहुंचने के लिए देना पड़ा है बलिदान

पृथ्वी शॉ को वेस्टइंडीज के खिलाफ अपने इंटरनेशनल डेब्यू का मौका मिला लेकिन पृथ्वी शॉ के लिए भारतीय टीम में यहां तक का सफर आसान नहीं रहा है। इसके लिए उन्हें और उनके पिता पंकज शॉ को बड़ा त्याग करना पड़ा है।

3 साल की उम्र में ही खो दिया मां का साया

पृथ्वी शॉ जब 3 साल से कुछ ही ज्यादा की उम्र के थे तो उन्होंने अपनी मां को खो दिया। पृथ्वी शॉ की मां का दुनिया से गुजरना पृथ्वी के लिए तो बड़ा झटका था ही साथ ही उनके पिता पंकज शॉ के लिए भी ये बहुत बड़ा नुकसान था।

अपनी पत्नी के गुजर जाने के बाद पंकज शॉ ने पृथ्वी को क्रिकेट एकेडमी में दाखिला दिलाया और अपना पूरा समर्पण अपने बेटे के लिए लगा दिया। आज उनके इस त्याग का परिणाम सबके सामने है।

विरार से बांद्रा रोज करना पड़ता था सफर

पृथ्वी शॉ और उनके पिता के लिए शुरूआती दौर आसान नहीं था। पंकज शॉ रोज सुबह 3.30 उठ जाता करते थे, जिसके बाद नहा-धोकर अपने और बेटे के लिए नाश्ता तैयार करते। इसके बाद विरार से बांद्रा तक लोकल ट्रेन में जाया करते थे।

इस दौरान जब पूरा दिन पृथ्वी प्रैक्टिस करता तो उनके पिता वहां पेड़ के नीचे बैठकर देखा करते थे। इसके बाद शाम को इसी तरह से पिता-पुत्र घर पहुंचते और खाना खाकर सो जाते थे। ये सिलसिला पृथ्वी को छात्रवृत्ति मिलने तक जारी रहा।

अपने कारोबार को बेचकर बच्चे को दिलाया प्रशिक्षण

पृथ्वी शॉ के पिता मुंबई में आने के बाद कपड़ो का कारोबार करते थे जो सूरत और बडोदा जैसे शहरों तक होता था। इस तरह से कारोबार अच्छा चल रहा था लेकिन बच्चे के लिए उन्होंने अपने इस कारोबार को बेच दिया।

अपने बेटे पृथ्वी को क्रिकेटर बनाने के लिए पंकज शॉ उनके पीछे ही लग गए। पूरा दिन पंकज शॉ अपने बेटे के साथ रहते थे ताकि वो एक ना एक दिन देश का प्रतिनिधित्व कर सके।

पृथ्वी को अपनी छुट्टियों का करना पड़ा बलिदान

क्रिकेट के प्रति पृथ्वी शॉ और उनके पिता पंकज शॉ इतने ज्यादा समर्पित हो चुके थे कि उन्होंने इसके लिए वेकेशन की छुट्टियों को तक कुर्बान कर दिया।

दोनों पिता-पुत्र छुट्टियों को त्यागकर पूरी तरह से क्रिकेट के लिए लग गए। उन्होंने भले ही उन दिनों इतना बड़ा बलिदान दिया लेकिन आज उनको एक बहुत बड़ा परिणाम भी मिला।

पूरा दिन नेट्स में करते रहते थे बल्लेबाजी

भारत जैसे क्रिकेट प्रेमी देश में इतनी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के बीच क्रिकेटर बनकर देश के लिए खेलना आसान नहीं होता है। इसलिए पृथ्वी शॉ ने अपने शुरुआती दौर से ही इस बात को गांठ बांध लिया था कि उन्हें क्रिकेटर बनना है।

इसके लिए वो पूरा-पूरा दिन नेट्स में बल्लेबाजी किया करते थे। पृथ्वी चाहे जितना थक जाते, लेकिन उनका सपना उन्हें थकान के बीच भी बैठने नहीं देता था।

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