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आख़िर कहाँ खो गया वह 90 के दशक का दौर, इस मामले में भारत था अग्रणी

मौजूदा दौर में विराट कोहली, जो रूट और स्टीव स्मिथ जैसे खिलाड़ियों ने बहुत से रिकॉर्ड अपने नाम किये हैं। लेकिन जब वक़ार युनुस, सचिन तेंदुलकर और वसीम अकरम जैसे दिग्गजों का नाम दिमाग में आता है, तो इन युवा खिलाड़ियों की क्लास भी फ़ीकी पड़ती हुई नज़र आती है।

हम यहाँ उन्हीं खिलाड़ियों के बारे में बात कर रहे हैं, जिन्होंने 90 के दशक में अपने खेल से पूरी दुनिया का मन मोह लिया। आज तक भी उन्हें महानों की सूची में केवल इसीलिए रखा जाता है, क्योंकि उस वक़्त का क्रिकेट, आज के दौर से कहीं रोचक हुआ करता था। आख़िर क्यों कह रहे हैं हम ऐसा, आइये डालते हैं ऐसे ही कारणों पर एक नज़र।

भारतीय क्षेत्ररक्षण

90 के दशक में और उससे पहले भारतीय फील्डरों को छकाने में छोटी टीमें भी कोई कसर नहीं छोडती थीं। मोहम्मद कैफ़ को आज भी दुनिया के बेहतरीन फ़ील्डरों में शुमार किया जाता है।

युवराज सिंह,  रोबिन सिंह और सुरेश रैना जैसे भारतीय फील्डरों को दशकों तक याद रखा जायेगा। क्योंकि इन्होंने भारतीय फ़ील्डिंग को एक नए मुकाम तक पहुँचाने में बहुत मदद की है।

वेस्ट-इंडीज़ का प्रभुत्व

इसमें कोई संशय की बात नहीं कि 80 और 90 के दशक में कोई भी टीम, वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ मैदान पर उतरने में कतराती थी। कर्टली एम्ब्रोज़ और कोर्टनी वॉल्श जैसे खिलाड़ियों को मैदान पर देखना, एक सुखद एहसास की अनुभूति होती थी।

इसके बाद कमान, शिव नारायण चन्द्रपॉल और कार्ल हूपर ने संभाली। लेकिन इस दौर के बाद यानी पिछला एक दशक वेस्ट-इंडीज़ क्रिकेट के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा है। तबसे वेस्ट-इंडीज़ ऊपर उठने में संघर्ष करती नज़र आई है।

भारत-पाकिस्तान के बीच प्रतिस्पर्धात्मकता का स्तर

भारत और पाकिस्तान मुक़ाबला, हालाँकि आज भी कुछ विरोधात्मक तत्वों की जुबान पर चढ़ा रहता है। जो कि इसे राजनीती से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

लेकिन जब बात मैदान की आती है, तो 90 के दशक में पाकिस्तान के पास एक ऐसी टीम होती थी, जो विरोधियों को पस्त करने में पूरी तरह सक्षम थी। इनमें वक़ार युनुस, वसीम अकरम और जावेद मियांदाद जैसे खिलाड़ी शामिल हुआ करते थे।

लेकिन अब वह रोमांच जानें कहीं खो सा गया है। भारत ने क्रिकेट की दुनिया में अलग ही मुकाम हासिल किया, तो वहीँ पाकिस्तान एक ख़राब दौर से उभर ही नहीं पा रहा है। इसलिए भारत पाकिस्तान मुक़ाबले का रोमांच भी साल दर साल कम होता जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया का बॉलिंग अटैक

वह दौर गया जब, ऑस्ट्रेलिया ने ग्लेन मैकग्रा, जेसन गिलेस्पी और शेन वॉर्न जैसे खिलाड़ियों के होते हुए कई विश्व कप अपने नाम किये। मिचेल जॉनसन के संन्यास के बाद मिचेल स्टार्क के रूप में गज़ब का गेंदबाज़ मौजूद है।

लेकिन जब बात एशियाई टूरों की आती है तो ऑस्ट्रेलिया पिछले दशक में कई स्पिनर्स पर प्रयोग कर चुका है। लेकिन टीम को ज्यादातर मौकों पर मुंह की खानी पडती है।

रिवर्स स्विंग की कला

एक दौर था जब पाकिस्तानी बॉलर्स, अपनी बॉल को स्विंग करा पाने की कला से अच्छे-अच्छे दिग्गज बल्लेबाजों को रन बना पाने से रोके रखते थे।

लेकिन यह कला आज के कुछ बॉलरों के पास ही बची है। एक समय था जब एकदिवसीय क्रिकेट में 260-270 का स्कोर मैच बचाने के लिए काफ़ी होता था। लेकिन अब बहुत से मैदान ऐसे हैं, जहाँ साढ़े तीन सौ के स्कोर को भी पहले खेलने वाली टीम बचाव, करने में आमतौर पर विफ़ल हो जाती है।

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