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ओलिंपिक खेलों में क्यों शामिल नहीं है कबड्डी

नई दिल्ली
कबड्डी भारत की मिट्टी से निकला खेल। अब यह खेल काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय हो गया है। इसकी लोकप्रियता अब गांव की चौपालों से निकलकर लोगों की ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी है। खेल मिट्टी से हटकर मैट तक पहुंच चुका है। भारत ने पुरुष कबड्डी में सात गोल्ड और एक ब्रॉन्ज मेडल जीता है।

ओलिंपिक खेलों के आवश्यक शर्तों में से एक यह है कि चार महाद्वीपों में कम से कम 75 देश किसी खेल को खेलते हों। इसके बिना किसी खेल को ओलिंपिक में जगह नहीं मिल सकती। जहां तक कबड्डी की बात है कि दुनिया में 30 से ज्यादा देश इसे खेलते हैं लेकिन यह आवश्यक 75 से काफी कम है। यही वहज है कि खेलों के महाकुंभ कहे जाने वाले ओलिंपिक खेलों में आप कबड्डी-कबड्डी की आवाज नहीं सुन पाते हैं।

कबड्डी को 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में थोड़ी सी जगह मिली थी। तब भारतीय दल ने इसका छोटा सा डैमो पेश किया था। लेकिन इसके अलावा विश्व के खेलों के सबसे बड़े मंच पर यह भारतीय खेल जगह नहीं बना पाया है।

कबड्डी में भी प्रो-कबड्डी लीग शुरू होने के बाद खिलाड़ियों के स्तर में काफी सुधार आया है। इस लीग में कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आकर खेल रहे हैं जिससे इस खेल को वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने में काफी मदद मिल रही है। टीवी पर खेल दिखाए जाने से लोगों को इससे जुड़ने में मदद मिल रही है और वह इस खेल की बारीकियां भी सीख रहे हैं।

कबड्डी अब भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया के कुछ देशों से बाहर जा रही है। कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अब लीग में खेल रहे हैं। वर्ल्ड कप और एशिया कप में दुनिया के कई देश भाग लेते हैं। भारत में भी कबड्डी के खिलाड़ियों को अब पहले से अधिक पहचान मिलने लगी है। आर्थिक रूप से भी खिलाड़ियों को पहले के मुकाबले अधिक फायदा हो रहा है। ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों के इससे जुड़ने से माना जा रहा है कि इस खेल को भविष्य में ओलिंपिक में जगह मिल सकती है।