आज क्रिकेट पुरे विश्व के सबसे लोकप्रिय खेलो में से एक है और बात अगर भारत की हो तो भारत में सबसे ज्यादा क्रिकेट के खेल का ही बोलबाला है. कोई भी खेल हो उसमे अपनी पहचान (नाम ) बनाने से ही होती है और प्रत्येक खिलाड़ी अपनी पहचान बनाने की होड़ में रहता है.
आईपीएल खुद को साबित करने का सबसे बड़ा मंच हो गया है, लेकिन आईपीएल में खुद को साबित करना भी बहुत बड़ी बात है. लेकिन आज के दौर में क्रिकेट में नाम बनाना काफी मुश्किल होता जा रहा है, ऐसे में पूर्व भारतीय ओपनर ने भी इस बात कहा.
1980-90 के दशक से मुश्किल : विरेन्द्र सहवाग

पूर्व भारतीय सलामी विस्फोटक बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग ने कहा ,
“1980 और 90 के दशक में क्रिकेट में नाम बनाना आसान था, लेकिन अब ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी छोटे-छोटे शहरों से भी उभर कर आ रहें हैं. बहुत ज्यादा संख्या में बच्चे आज एक पेशेवर क्रिकेट खेलने के लिय खुद को तैयार कर रहें हैं. ऐसे वातावरण में नाम बनाना आसान नहीं होने वाला. यह केवल अच्छा करने से नहीं होने वाला इसके लिए आपको प्रतिभाशाली होना भी जरुरी है और खुद के खेल में परिवर्तन लाने की क्षमता हो.”
आगे उन्होंने कहा कि,
“अगर कोई युवा खिलाड़ी खुद को किसी बड़े लीग में बनाने में सफल हो जाता है और लगातार अपनी खेल में निरंतरता और बदलाव लाता रहता है, तो वह भविष्य में 10-12 साल तक खेल सकता है और अच्छे पैसे कमा सकता है”.
टीवी चैनल डिस्कवरी ‘ऑल एक्सेस: द कंटेंट’ नामक एक नए शो में आकांक्षी क्रिकेटरों के परीक्षणों और संघर्षों को उजागर करेगा.
इस बार आईपीएल सीजन मे शामिल हुए क्रिकेटर शिवम दुबे( मुंबई के ऑल राउंडर), कमलेश नगरकोटी( राजस्थान के तेज गेंदबाज), इशान पोरेल( पश्चिम बंगाल के मध्यगति के गेंदबाज), हर्विक देसाई ( गुजरात के विकेटकीपर बल्लेबाज), कौसिन अनमोलप्रीत( बल्लेबाज), और प्रभासिमरन सिंह( पंजाब के विकेटकीपर बल्लेबाज) की यात्रा इस शो का हिस्सा होंगे.
दिल्ली- मुंबई के होते थे खिलाड़ी : सहवाग

आगे इस बारे में वीरेन्द्र सहवाग ने कहा,
“अगर आप 80 और 90 के दशक में देखें, तो दिल्ली, मुंबई आदि जैसे महानगरों के बहुत सारे खिलाड़ी थे,लेकिन अब यह बदलते हुए प्रतीत हो रहा है. भारतीय टीम में छोटे शहरों के खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है.”
यह शो युवा आकांक्षाओं को इस बात की एक झलक देगा कि कोच, फ्रेंचाइजी और टीम प्रबंधन उनकी खेल में छवि की पहचान हो सके. यह इस बात को भी सामने लाता है कि खेल के छोटे प्रारूप की कभी-कभी बदलती गतिशीलता में बने रहने के लिए खुद के खेल को बदलना कितना मुश्किल है.
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