बॉबी फिशर -एक महानतम शतरंज खिलाड़ी की जीवन गाथा
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बॉबी फिशर का जन्म अमेरिका के शिकागो में 9 मार्च 1943 को हुआ था शुरुआती दिनो में अपनी बड़ी बहन जॉन से उन्होने शतरंज खेलना सीखा । उनके पिता बचपन से उनके पास नहीं थे और यह बात उन्हे हमेशा परेशान करती थी उनकी माँ रेजिना फिशर बेहद ही विद्वान महिला थी और उन्हे कई भाषाओं का ज्ञान था वो एक नर्स भी थी और सामाजिक कार्यकर्ता भी थी । उनके खिलाफ अमेरकी खुफिया विभाग हमेशा लगा रहता था इन सब के बीच वो हमेशा कोशिश करती की बॉबी हमेशा सबसे अच्छा व्यवहार करे पर फिशर का स्वभाव बचपन से ही आक्रामक होने लगा था और इस बात की चिंता हमेशा उनकी माँ को लगी रहती ।उन्होने फिशर को शतरंज मे आगे बढ्ने के लिए हर मुमकिन प्रयास किए ।

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पर शतरंज जैसे उनके जीवन में एक अनोखा संतुलन लेकर आया और उन्हे कुछ ऐसा मिल गया जो उनके समय को बेहतरीन ढंग से काटने का माध्यम बन गया । करीब 12 वर्ष की उम्र में 1955 में उन्होने टूर्नामेंट में भाग लेना शुरू किया और असाधारण तरीके से प्रगति की और मेहनत भी इतनी की उनकी माँ उन्हे एक मनोवैज्ञानिक को दिखाने ले गयी तो उसने कहा की फिशर को शतरंज खेलना बंद कराना ही सबसे बड़ा खतरा होगा । दरअसल यही बात अंत में सच साबित हुई खैर 14 वर्ष की आयु में फिशर अमेरिका के सान फ्रान्सिस्को में राष्ट्रीय जूनियर चैम्पियन बन गए और उसी वर्ष सभी को चौंकाते हुए उन्होने क्लीवलैंड में अमेरिकन ओपन जीत लिया और न्यू यॉर्क में वे मात्र 15 वर्ष की आयु में अमेरिका शतरंज इतिहास के सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय विजेता बन गए ।

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फिशर आगे बढ़ना चाहते थे पर आड़े आ रही थी की भाषा सभी अच्छी किताबे रूसी भाषा में हुआ करती थी अतः उन्होने किताबे पढ़ने के लिए सोवियत भाषा रूसी सीखी । 1957 में वे इंटरनेशनल मास्टर बन गए और एक साल बाद ना सिर्फ केंडीडेट टूर्नामेंट के लिए चयनित हो गए बल्कि विश्व शतरंज इतिहास के सबसे कम उम्र के ग्रांड मास्टर बन गए । इस दौरान फिशर की जिंदगी पूरी तरह से शतरंज के रंग में रंग गयी और सोते जागते ,खाते हर समय वो कोई नयी किताब पढ़ते रहते ।

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1960-70 का दशक सही मायनों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर उन्हे स्थापित करने वाला रहा पर इस दौरान कई बार बीच में उन्होने खेलना बंद भी किया अगर फिशर अपने पूरे समय का उपयोग पूरे मन से इस खेल में करते तो शायद आप और हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते वो इतनी सफलतए अर्जित करते । 1960 में उन्होने प्रतिष्ठित मार डेल प्लाटा और रेक्जाविक इंटरनेशनल के खिताब अपने नाम किए उन्होने अमेरिका के लिए खेलते हुए लेपजिग शतरंज ओलंपियाड में पहले बोर्ड पर खेलते हुए 18 में से 13 अंक बनाए और अमेरिकन नेशनल चैंपियनशिप भी जीती । और फिर अचानक फिशर शतरंज के नक्शे से गायब हो गए ,1962 में उन्होने स्टॉकहोल्म इंटर ज़ोनल जीतकर अपनी शानदार वापसी दर्ज की उसी वर्ष वे कुरकाओ केंडीडेट्स टूर्नामेंट में चौथे स्थान पर रहे । एक बार फिर इसके बाद फिशर नें खेलना लगभग बंद सा कर दिया पर इस दौरान उन्होने अपने प्रमुख विरोधियों के खेल को ध्यान लगाकर अध्ययन करना शुरू कर दिया ।
1966 उनकी शानदार वापसी का गवाह बना उन्होने पुनः अमेरिकन चैंपियनशिप जीती ,और वो पियातीगोर्स्की कप और सांता मोनिका में दूसरे स्थान पर रहे उन्होने इस अमेरिका से ओलंपियाड खेलते हुए हवाना में 17 में से कुल 15 अंक बनाकर नया रिकॉर्ड बनाया । 1967 में उन्होने एक बार फिर अमेरिकन चैंपियनशिप जीती और साथ ही मोंटे कार्लो और स्कोपजे में भी जीत दर्ज की । दुनिया को एक बड़ा झटका देते हुए उन्होने इंटर ज़ोनल टूर्नामेंट के शुरुआती राउंड के बाद ही अपना नाम वापिस ले लिया और वे इस तरह विश्व चैंपियनशिप पहुँचने की प्रक्रिया से बाहर हो गए ।
1970 के बाद के समय को आप फिशर के खेल जीवन का स्वर्णिम हिस्सा कह सकते है लगभग 2 साल से भी ज्यादा समय के बाद खेल में वापस आए फिशर नें आते ही धूम मचा दी और वह निश्चित तौर पर अपनी गलतियों से सीखकर तो अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर वापस लौटे थे ।

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“मैच ऑफ थे सेंचुरी “ में उन्होने पूर्व विश्व चैम्पियन पेट्रोसियन पर 3-1 से जीत दर्ज की ,साथ ही ज़गरेब ,ब्यूनोस और प्लामा दे माल्लोर्का इनेर्ज़ोनल जीत कर वह विश्व चैंपियनशिप के लिए साफ तौर पर केंडीडेट बन गए हालांकि उससे पहले उन्हे कुछ मैच जीतने थे । 1971 में दिग्गज मार्क टाइमनोव और बेंट लार्सन को 6-0 से हराकर पूरे शतरंज जगत में सनसनी फैला दी अब विश्व चैंपियनशिप और फिशर के बीच सिर्फ एक बाधा थी अनुभवी और ज्ञानी पूर्व विश्व चैम्पियन पेट्रोसियन पर फिशर नें उन्हे भी बेहद आसानी से (+5-1+=) से पराजित करते हुए बोरिस स्पासकी के लिए खतरे की घंटी बजा दी थी । इस मैच के बाद पेट्रोसियन नें एक इंटरव्यू में कहा “फिशर एक असाधारण खिलाड़ी है ,जो बोर्ड पर जल्द ही समस्या को समझकर उसका समाधान सही तरीके से करते है । उन्हे लगभग हर ओपेनिंग अपनी लगती है और उन्हे चौंकना लगभग नामुंकिन है । अगर उन्हे थोड़ा भी बढ़त मिलती है तो वो एक मशीन की तरह खेलने लगते है ,वो बहुत ही खास खिलाड़ी है और स्पासकी से होने वाला उनका मैच बहुत ही जोरदार और कडा मुक़ाबला होगा “

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और फिर समय आया उस मैच का जिसके चर्चे आज भी उसी तरह होते है जैसे उस समय होते थे । फिशर –स्पासकी का मैच एक ऐसी विश्व चैंपियनशिप जिसने शतरंज की बिसात को पूरी दुनिया में फैला दिया और कारण बिलकुल स्पष्ट था बॉबी फिशर की कुछ अजीबो-गरीब शर्ते और उनका शानदार खेल ये दोनों ही वजह काफी थी पूरी दुनिया का ध्यान शतरंज की ओर खीचने के लिए ।

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इस बीच फिशर नें इस विश्व चैंपियनशिप से पहले बेहद कड़ी शारीरिक मेहनत शुरू की यह बताता है कैसे फिशर यह मानते थे की और जानते थे की शारीरिक रूप से मजबूत होना कितना ज्यादा आवशयक है और एक तंदरुस्त शरीर वाला खिलाड़ी ही अच्छी शतरंज खेल सकता है वो प्रतिदिन घंटो का समय व्यायाम ,टेबल टेनिस तैराकी ,साइकिलिंग और अन्य शारीरिक खेलो मे देकर अपने आप को विश्व चैम्पियन बनाने के लिए तैयार हुए ।
फिशर नें मैच के पहले एक बड़ी पुरुष्कार राशि की मांग की जो उस समय शतरंज जैसे खेल में सोचना भी नामुंकिन थी उनकी इस मांग नें पूरी दुनिया की मीडिया को उनके पीछे लगा दिया जल्द ही मीडिया नें इस मैच को पूर्व और पश्चिम का मुक़ाबला बना दिया । उन दिनो अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध की स्थिति थी ऐसे में रूस के शतरंज साम्राज्य को चुनौती देता एक बेहद प्रतिभाशाली युवा मीडिया के लिए एक जबरजस्त मसाला खबर बन गयी और यही अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां । 1948 से विश्व चैम्पियन का ताज रूस के ही पास था और अब इसे चुनौती देने एक अमेरिकन आ चुका था और दुनिया के लिए यह रोमांचक बात थी कुल मिलाकर ऐसा लगने लगा जैसे रूस के खिलाफ बॉबी फिशर अमेरिका नहीं बाकी सारी दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रहे थे ।

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1972 विश्व चैंपियनशिप की शुरुआत भी किसी बॉलीवुड फिल्म स्टोरी से कम नहीं थी फिशर पहला मैच हार गए और उन्होने कहा की कैमरा बहुत आवाज कर रहा है इसे अलग कर दीजिये उन्होने कहा की दर्शक भी काफी पास बैठे है इन्हे भी पीछे करिए आयोजको नें ऐसा करने से मना कर दिया फिर क्या था बॉबी दूसरे मैच में खेलने ही नहीं आए और दूसरा मैच भी स्पासकी के खाते में चला गया

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और फिशर न सिर्फ 2-0 से पीछे हो गए बल्कि उनका आगे खेलना भी संदिग्ध हो गया । कहते है स्पासकी को इस तरह जीतना पसंद नहीं था और उन्होने फिशर की मांग मान ली जिसकी सोवियत लोगो नें बहुत आलोचना भी की पर इसके साथ ही आगे के मैच बेसमेंट में खेले गए ताकि कोई आवाज ना हो और विडियो का प्रसारण औडिटोरियम में किया गया ।

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फिशर इसके बाद जैसे पूरी तरह से लय में आ गए और उन्होने शानदार खेल दिखाते हुए अगले आठ मैच मे से एक भी नहीं गवाया और 5 जीत और 3 ड्रॉ के साथ 6.5-3.5 से आगे हो गए । कुल 27 मैच की इस विश्व चैंपियनशिप मे वो सिर्फ एक बार और 11वां मैच हारे और स्कोर 6.5-4.5 हुआ पर इसके बाद बस उन्होने कोई मैच नहीं गवाया और अगले 10 मैच में 8 ड्रॉ और 2 जीत दर्ज करते हुए 12.5-8.5 से मात्र 21 मैच में ही विश्व चैंपियनशिप जीत ली । बॉबी की ये जीत दरअसल विश्व शतरंज इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा लोकप्रिय जीत साबित हुई । अगर आप बाकी सब बातों को किनारे रख दे तो यह अकेली विश्व चैंपियनशिप नें आने वाली शतरंज की प्रभाव उसके प्रचार -प्रसार में ऐसी भूमिका निभाई जो शायद ही कभी कोई और कभी निभा सके ।

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इसके बाद एक सुंदर सपने की तरह सच हुई फिशर की कहानी एक बुरे सपने में बदल गयी जल्द ही फिशर नें खेल से सन्यास ले लिया कहने वाले तो यह भी कहते है की फिशर नें खेलने से मना किया क्यूंकी उन्हे लगा की कोई उन्हे जब हरा ही नहीं सकता तो खेलने में मजा ही नहीं आएगा । खैर अगर फिशर और खेलते तो निश्चित तौर आज विश्व शतरंज के पास उनके खेल से सीखने का और शायद शतरंज दुनिया में और ज्यादा प्रसिद्ध खेल होता । 1975 में इनके विश्व चैंपियनशिप में उनके कारपोव से नहीं खेलने की वजह से 1975 में कार्पोव को 12 वां विश्व चैम्पियन घोषित कर दिया गया । करीब 20 साल बाद 1992 में कई लोगो के प्रयास से बॉबी फिशर और स्पासकी नें एक युगोस्लाविया में एक मैच खेला और इतने सालो बाद भी बॉबी फिशर नें स्पासकी को 15-5 से मुक़ाबला जीत लिया

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और साथ ही जीती 5 मिलियन डॉलर पुरुष्कार राशि और वो बुडापेस्ट चले गए । युगोस्लाविया के साथ अपने बेहद खराब संबंधो के चलते अमेरिका सरकार फिशर से नाराज हो गयी और तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज एचडबल्यू बुश नें एक अमेरिकन हीरो को देशद्रोही बना दिया और उनकी देश वापसी पर 10 सालो की जेल और भारी जुर्माना घोषित कर दिया और यही कारण रहा की फिशर इसके बाद कभी अमेरिका वापस नहीं आए । और अपने जीवन के अंतिम 16 साल उन्होने देश के बाहर ही बिताए । इसके बाद उनके संबंध अमेरिका से और बिगड़ते चले गए और 2004 मे अमेरिका सरकार नें उनका पासपोर्ट रद्द घोषित कर दिया और उन पर टेक्स चोरी के आरोप मढ़ दिये और जुलाई 2004 मे जापान की यात्रा के दौरान उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया ।

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पर ऐसे में उनकी आइसलैंड की महिला मित्र और तब की साथी मियोको वटाई नें संकट मोचक बनकर सामने आई और आइसलैंड सरकार नें फिशर को अपनी नागरिकता प्रदान कर दी और उन्हे जेल से मुक्त कर दिया गया । 2005 तक उन्होने शादी कर ली और आइसलैंड में ही रहने लगे पर कहा यह भी जाता है उन्होने मरिलयन यंग से भी शादी की और उनकी जिंकी यंग नाम की बेटी भी है पर अभी तक कानूनन तौर पर इसकी लड़ाई जारी है

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2005 के बाद से फिशर की सेहत उनका साथ छोड़ने लगी थी और इसके बाद उनकी अंतिम साँसो तक याने 17 जनवरी 2008 तक फिशर सामाजिक तौर पर कभी नजर नहीं आए ।
इसके साथ ही एक विजेता एक महान शतरंज खिलाड़ी और खेल का अब तक का सबसे बड़ा विद्वान बॉबी फिशर की दुनिया से विदाई हो गयी शायद वो इससे कंही अच्छी विदाई के हकदार थे लेकिन कहते है ना की जो दिल में जगह बना ले वो ही असली इंसान है दरअसल बॉबी फिशर हमेशा के लिए अमर हो गए और आज भी उन्हे दुनिया का सबसे महान खेल को समझने वाला खिलाड़ी माना जाता है उनकी किताब “मेरे 60यादगार मैच “ अब भी दुनिया में शतरंज पढ़ने वालों के लिए बेहद खास किताब मानी जाती है ।
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